glimpse
Tuesday, September 14, 2010
paheli
तुम इक अजीब पहेली हो इस जीवन में
लगता है इक घनघोर घटा हो जीवन में
कब बरसोगी मालूम नहीं है मुझे बरसो से
कब भर दोगी दामन छाल्कागे पैमाने से
अरे अब तो जीवन कि शाम आने को है
कि कब बंद होगी ये आँखे इस पैमाने में
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