Thursday, February 24, 2011

raat

रात की ख़ामोशी भी अपने आप में बहुत छुपाये हुए है
क्या क्या न घटता है इस रात के अँधेरे में
कुछ दिखता है कुछ नहीं दिखता है ,कोही करता है ,कोही सोचता है
किसी के लिए ये रात काली है ,तो किसी के लिए भरपूर खजाना है

पूरी काइनात में ये रोज़ अपनी दस्तक देती है
किसी को  इंतज़ार रहता है ,तो कोही परेशां होता है
आखिर क्योकर होता है यह सब हर रात को
क्या दिन के उजाले से डरते है ये सब लोग

ऐ मालिक क्यों बनाई यह खामोश और भयानक रात हर रोज़
माना हर रोज़ सुबह भी आती है हर कही रात के बाद
पर वो कहा  सुहानी सुबह जो बदल के रख दे काली रात का समा
पर लगता है आपका भी पूरा सहयोग है इस काली रात में .

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