Friday, November 25, 2011

subah


क्यों आती है यह सुबह रोज़
क्यों खिलते है ये फूल रोज़
क्यों खिलते है नए पत्ते रोज़
आती है फिर ओंस रोज़ सुबह
हां फिर खुलती है नींद रोज़ सुबह
की सूर्य जगाता है नए नूतन दिन में
की देता है सन्देश कुछ नया करने को
की काली अँधेरी रात गई भाग अब
की कुदरत ने छटा बिखेरी है प्यार की
की लहरा रही है फसल झूम झूम कर
की प्यार कर की प्यार कर

Monday, November 21, 2011

insaan

अथाह सागर है भरा हुआ है किद्विन्तियो से
किधर से करे शुरुआत करे  हकीक़तो के कोने से

अजीब है यह जानना कि कैसा था इंसान
शुरू के धरती के इन कुदरत के इन विरानो में

है अजीब खेल ये धरती पर इश्वर के अगिनित खेलोs में
कि कठपुतली  बना के भेजा मिटी के इस मानव को

कि मजे लेता है रोज़ इन्सान के अध्बुद करतबों के
कही लड़ता है कही करता है प्यार वो मिटी के पुतलो से

करता है ये खेल जिंदगी भर इन खुबसूरत नजारों में
कि जब तक बंधी है यह डोर सांस कि इस मिटी के पुतले में