जिंदगी अजीब सी पहेली है
इक अजीब सी सहेली है
क्यों न गले लगाये इसको
क्यों न मुस्कराए इससे
क्यों न इतराए हम मिलके इससे
क्यों न गले लगाये इसको
Friday, December 24, 2010
Tuesday, December 14, 2010
pyaar
क्यों है ये ज़िन्दगी इतनी खफा हमसे
क्यों है खुशिया दूर इतनी सदा हमसे
क्या प्यार अब किताबे के किसे है केवल
क्या मतलब बदल गया प्यार का इस जहाँ में
क्या रिश्ते ,क्या नाते ,क्या दोस्त, क्या हम प्याले
अब नज़र आता है हर कही पैसा और पैसा और पैसो का प्यार
ऐ दोस्त मत भूल कि यह है चलता सिक्का ,नहीं रुकता कही
क्या मुकाबला करेगा ये प्यार से कि खुद का कोही ठिकाना नहीं
क्यों है खुशिया दूर इतनी सदा हमसे
क्या प्यार अब किताबे के किसे है केवल
क्या मतलब बदल गया प्यार का इस जहाँ में
क्या रिश्ते ,क्या नाते ,क्या दोस्त, क्या हम प्याले
अब नज़र आता है हर कही पैसा और पैसा और पैसो का प्यार
ऐ दोस्त मत भूल कि यह है चलता सिक्का ,नहीं रुकता कही
क्या मुकाबला करेगा ये प्यार से कि खुद का कोही ठिकाना नहीं
Thursday, December 9, 2010
patther raah ka
यह पत्थर है राह का ,देखता है हर इक को
जो न देखे इसे राह में ,धूल में मिलता है वोह
कुदरत का अजब करिश्मा है ये ,काम आता है यह सब के
रहने को देता है साथ सबको ,कि महल भी बनवाता है किसी का
कि फोढ़ देता है सर भी किसी का ,कि नज़रे फेर दी किसी ने
कि ऐ इंसान सँभाल कर चल ,कि कभी मंदिर में पूजता है यह पत्थर
कि न कर गुमान ऐ इंसान इस जग में ,बसता है ईश्वर हर किसी में
मत भूल कि कुछ न लाया था इस जग में ,न भूल कि कुछ न ले जाएगा इस जग से
जो न देखे इसे राह में ,धूल में मिलता है वोह
कुदरत का अजब करिश्मा है ये ,काम आता है यह सब के
रहने को देता है साथ सबको ,कि महल भी बनवाता है किसी का
कि फोढ़ देता है सर भी किसी का ,कि नज़रे फेर दी किसी ने
कि ऐ इंसान सँभाल कर चल ,कि कभी मंदिर में पूजता है यह पत्थर
कि न कर गुमान ऐ इंसान इस जग में ,बसता है ईश्वर हर किसी में
मत भूल कि कुछ न लाया था इस जग में ,न भूल कि कुछ न ले जाएगा इस जग से
Saturday, November 20, 2010
Wednesday, November 17, 2010
pyar
आखिर यह प्यार क्या चीज है
जिसमे हम सभी बेबस है इसे पाने को
लगता है सब सूना अपने चारो और
भुझी भुझी सी आँखे भुझा भुझा चेहरा
लगती है खामोश फिझाए हर कही
नहीं लगता योवन इन उमरती घटाओ में
नहीं दिखती खिलखिलाहट इन रंगीले फूलो में
कि प्यार नहीं है मेरा इन चाहत भरी नजरो में
जिसमे हम सभी बेबस है इसे पाने को
लगता है सब सूना अपने चारो और
भुझी भुझी सी आँखे भुझा भुझा चेहरा
लगती है खामोश फिझाए हर कही
नहीं लगता योवन इन उमरती घटाओ में
नहीं दिखती खिलखिलाहट इन रंगीले फूलो में
कि प्यार नहीं है मेरा इन चाहत भरी नजरो में
pyar
क्यों कोही पूछे मुझसे ये राज़ कि बाते
कि वोह न था कभी राजदार मुझसे कभी
बीत गयी वो राते ,बीत गयी वो बाते
बीत गए वो पल ,बीत गयी वो प्यार भरी बाते
यादगार रह गए वो सुनहरे प्यार भरे पल
याद रह गई वो वोह प्यार भरी कसमे
न भुला पाहुंगा में यह सभी जीवन भर
कि तुम आज भी बसी हो मेरे तन मान में
कि वोह न था कभी राजदार मुझसे कभी
बीत गयी वो राते ,बीत गयी वो बाते
बीत गए वो पल ,बीत गयी वो प्यार भरी बाते
यादगार रह गए वो सुनहरे प्यार भरे पल
याद रह गई वो वोह प्यार भरी कसमे
न भुला पाहुंगा में यह सभी जीवन भर
कि तुम आज भी बसी हो मेरे तन मान में
Tuesday, November 9, 2010
sapne
सपने जरुर होने चाहिए हर जिंदगी में
कि उसे पूरा करने में अपने को डाल देना चाहये
कि सपने अपनी उमीद है कि सपने अपनी आशा है
कि सपनो में जीने का अपना निराला अंदाज़ है
क्यों नहीं होंगे पूरे सपने हर इंसान के इस धरती पर
कि बेइंतिहा सौन्द्रिय बिखरा परा है इस धरती पर
क्यों नहीं जिए हर वो ख़ुशी से इस संसार में
कि नहीं मिलती मानव योनी हर इक जीव को संसार में
कि उसे पूरा करने में अपने को डाल देना चाहये
कि सपने अपनी उमीद है कि सपने अपनी आशा है
कि सपनो में जीने का अपना निराला अंदाज़ है
क्यों नहीं होंगे पूरे सपने हर इंसान के इस धरती पर
कि बेइंतिहा सौन्द्रिय बिखरा परा है इस धरती पर
क्यों नहीं जिए हर वो ख़ुशी से इस संसार में
कि नहीं मिलती मानव योनी हर इक जीव को संसार में
Saturday, November 6, 2010
adbudh jeevan
सर्द सर्द पवन के झोंके लिए इस सुबह का स्वागत है
कि रात अभी अभी ख़तम हुई है काले सायो के साथ
सूर्य कि उजली धुप मानो दे रही है नया सन्देश
कि करना है कुछ नया कि हो रहे याद बरसो तक
नहीं करना है बेकार यह अदबुध कीमती वक्त
कि बहुत मुश्किल से पाया है मानव का यह जन्म
ऐ हवाओ ले चल मुझे उढ़ा कर कही दूर खितिज़ पर
कि पा सकू कुछ बहुत नया इस मानव जीवन में कही
कि रात अभी अभी ख़तम हुई है काले सायो के साथ
सूर्य कि उजली धुप मानो दे रही है नया सन्देश
कि करना है कुछ नया कि हो रहे याद बरसो तक
नहीं करना है बेकार यह अदबुध कीमती वक्त
कि बहुत मुश्किल से पाया है मानव का यह जन्म
ऐ हवाओ ले चल मुझे उढ़ा कर कही दूर खितिज़ पर
कि पा सकू कुछ बहुत नया इस मानव जीवन में कही
Saturday, October 23, 2010
khwab
दूर गगन के ये चमकीले ,टिमटिमाते ये सितारे
और बीच में विराजे ये सुंदर चमकीले मामा चंदा
क्यों नहीं मंगाऊ दो पंख इस उरती चिरिया से में
क्यों नहीं पहुचू में बीच झिलमिलाते सितारों में
कि दूर से बुलाते है ये मुझको उढ़ कर आने को
हां हां अभी अभी बात हुई है मेरी चंदा मामा से
पर ये क्या दूर नज़र आती है ये सुनहरी किरने
अरे हां यह सुंदर ख्वाब था इस खामोश रातो का
और बीच में विराजे ये सुंदर चमकीले मामा चंदा
क्यों नहीं मंगाऊ दो पंख इस उरती चिरिया से में
क्यों नहीं पहुचू में बीच झिलमिलाते सितारों में
कि दूर से बुलाते है ये मुझको उढ़ कर आने को
हां हां अभी अभी बात हुई है मेरी चंदा मामा से
पर ये क्या दूर नज़र आती है ये सुनहरी किरने
अरे हां यह सुंदर ख्वाब था इस खामोश रातो का
Sunday, October 17, 2010
Thursday, October 14, 2010
intzzar
कियोकर न पिए कोही इन सुनसान विरानो में
न दूर तक दिखती है कोई नज़र इन रस भरे बागो में
था इंतज़ार किसी साकी के आने का
न आये वो घंटो इंतज़ार के बाद भी
कि चाहत थी मुझे छूने कि इन प्यार भरे लम्हों कि
कि अब न आएगी कभी ये रात इन लम्हों को भुलाने कि
आती है आहट बार बार किसी के छम छम कदमो कि
कि आस जाति नहीं उन मध् भरी आँखों कि .
न दूर तक दिखती है कोई नज़र इन रस भरे बागो में
था इंतज़ार किसी साकी के आने का
न आये वो घंटो इंतज़ार के बाद भी
कि चाहत थी मुझे छूने कि इन प्यार भरे लम्हों कि
कि अब न आएगी कभी ये रात इन लम्हों को भुलाने कि
आती है आहट बार बार किसी के छम छम कदमो कि
कि आस जाति नहीं उन मध् भरी आँखों कि .
thahake
कियो आज अजीब सी लगती है यह उजली सी धूप
कियो आज लगती है यह हलकी पवन कि सिरहन
कियो आज आती है कानो में अजीब सी सनसनाहट
लियो आज अजीब सी हरकत है इन बाहौ के बालो में
कही ये आगाज़ तो नहीं है किसी मध् भरी आँखों का
कही ये अंदाज़ तो नहीं है किसी के स्वागत करने का
कही ये बयां तो नहीं है उस चंचल हसी भरे ठहाको का
हां यह सच है वोह यही है वोह यही है साथ अपने ठहाको के
कियो आज लगती है यह हलकी पवन कि सिरहन
कियो आज आती है कानो में अजीब सी सनसनाहट
लियो आज अजीब सी हरकत है इन बाहौ के बालो में
कही ये आगाज़ तो नहीं है किसी मध् भरी आँखों का
कही ये अंदाज़ तो नहीं है किसी के स्वागत करने का
कही ये बयां तो नहीं है उस चंचल हसी भरे ठहाको का
हां यह सच है वोह यही है वोह यही है साथ अपने ठहाको के
Friday, October 8, 2010
sangam
यु तो न थी कभी लहरों में चंचलता
यु तो न था कभी उफ्फान लहरों में
ऐसा कियो लगता है कि अल्हर सी लगती है ये लहरे
किया कुछ या बहुत कुछ मिल गया है इन बलखाती लहरों को
शायद ये अति खुश है इसलिए कि होना है संगम चांदनी रातो में
अब दूर नहीं है मंजिल इन लहरों से कि निकट है समुंदर संगम को
यु तो न था कभी उफ्फान लहरों में
ऐसा कियो लगता है कि अल्हर सी लगती है ये लहरे
किया कुछ या बहुत कुछ मिल गया है इन बलखाती लहरों को
शायद ये अति खुश है इसलिए कि होना है संगम चांदनी रातो में
अब दूर नहीं है मंजिल इन लहरों से कि निकट है समुंदर संगम को
bandhan
हां यह सच है करता हु प्यार इस हिरन सी आँखों को
हां यह सच है दीवाना हु प्यार में जल से भरी इन आँखों में
हां यह सच है खोया रहता हु दिन रात इन मदभरी आँखों में
हां यह सच है छीन लिया है घर बार मुझसे इन चंचल आँखों ने
अब तो खुवाइश है इस दिल को कि न दूर करे पल भर मुझको प्यार भरी आँखों से
या खुदा अब तो इल्तजा है जी भर कर कि बांध दे यह बंधन जीवन भर को
हां यह सच है दीवाना हु प्यार में जल से भरी इन आँखों में
हां यह सच है खोया रहता हु दिन रात इन मदभरी आँखों में
हां यह सच है छीन लिया है घर बार मुझसे इन चंचल आँखों ने
अब तो खुवाइश है इस दिल को कि न दूर करे पल भर मुझको प्यार भरी आँखों से
या खुदा अब तो इल्तजा है जी भर कर कि बांध दे यह बंधन जीवन भर को
Monday, October 4, 2010
haq
कैसी है दुनिया ,कैसे हे ये लोग
चल रहे है चल रहे है बेखोफ
करते है जुर्म इन्सनिएत पर
कहते है हम इन्सान है
छिनकर हक दूसरो का अपनी झोली में
कहते है हम मालामर है इस टोली में
कहते है हम इज्ज़तदार है करते है प्यार
अरे ऐ इन्सान कब तक सच छुपाएगा इन यारो से
किया होगा उस दिन जब परेगी मार यारो कि
कि मुह ना दिखा पायेगा यारो कि टोली में
चल रहे है चल रहे है बेखोफ
करते है जुर्म इन्सनिएत पर
कहते है हम इन्सान है
छिनकर हक दूसरो का अपनी झोली में
कहते है हम मालामर है इस टोली में
कहते है हम इज्ज़तदार है करते है प्यार
अरे ऐ इन्सान कब तक सच छुपाएगा इन यारो से
किया होगा उस दिन जब परेगी मार यारो कि
कि मुह ना दिखा पायेगा यारो कि टोली में
Tuesday, September 28, 2010
ahsas
ऐसा क्यों लगता है कि वोह न आएगा कभी
ऐसा क्यों लगता है कि प्यार छुट गया मुझसे
क्या यह अहसास है सच का या धुंधले खियालो का
क्या यह अहसास है उन सुंदर बिताये पलो का
न भूल पाहुंगी उन प्यार भरे मोहक लम्हों को
कि जीवन कि अद्बुद भुझी उस प्यार के अहसास को
ऐ खुदा, ऐ परवरदिगार विनती है मेरी इन चरणों में
मिला दे इक बार मेरे बिछरे रूठे खेवनहार को
ऐसा क्यों लगता है कि प्यार छुट गया मुझसे
क्या यह अहसास है सच का या धुंधले खियालो का
क्या यह अहसास है उन सुंदर बिताये पलो का
न भूल पाहुंगी उन प्यार भरे मोहक लम्हों को
कि जीवन कि अद्बुद भुझी उस प्यार के अहसास को
ऐ खुदा, ऐ परवरदिगार विनती है मेरी इन चरणों में
मिला दे इक बार मेरे बिछरे रूठे खेवनहार को
Monday, September 27, 2010
insaniet
कितना बदल गया है ये इन्सान कि भूल गया इन्सानिएत
न होश उसे चाहत का न होश उसे रिश्तो का, अपनेपन का
न याद उसे उस बचपन कि न याद उसे उस बीते पलो कि
कि इन पलो पर कितनी प्यार से बिताई थी वो राते और दिन
दूर खंडर सी नज़र आती है वो आराम देती वो छत और ईटे
कहा है वो बाग़ और बगीचे जिस में खाए थे खूब शहतूत घनेरे
कहा है वोह बहिन भाई जो थे साथ हर समय हर दुःख सुख में
कहा गयी माँ कि प्यारी गोद और पिता कि प्यार भरी भाए
न दूंड अह दोस्त ये सब कि सब गवा दिया तुमने इस रुपैये कि खातिर
कि सब कुछ लुट गया इस धरती से तुम्हारे इस रुपैये के खातिर
न होश उसे चाहत का न होश उसे रिश्तो का, अपनेपन का
न याद उसे उस बचपन कि न याद उसे उस बीते पलो कि
कि इन पलो पर कितनी प्यार से बिताई थी वो राते और दिन
दूर खंडर सी नज़र आती है वो आराम देती वो छत और ईटे
कहा है वो बाग़ और बगीचे जिस में खाए थे खूब शहतूत घनेरे
कहा है वोह बहिन भाई जो थे साथ हर समय हर दुःख सुख में
कहा गयी माँ कि प्यारी गोद और पिता कि प्यार भरी भाए
न दूंड अह दोस्त ये सब कि सब गवा दिया तुमने इस रुपैये कि खातिर
कि सब कुछ लुट गया इस धरती से तुम्हारे इस रुपैये के खातिर
ishwar
वाह ईश्वर वाह कियू बनाया यह संसार
हर बुत में दी जान कियो बनाया यह संसार
कियो ये नज़ारे बनाये कियो दिखाया इन्हें नजरो से
कियो ये बुत बनाये सांसे दे कर चलने को
कियो ये जबान दी इस दर्द को कहिने को
कियो दर्द दिया इस बुत में सहने को
किया रहम नहीं आया इतना करने पर
कि दे दिया पेट इस बुत में लरने को
वाह ईश्वर वाह कियो बनाया यह संसार
हर बुत में दी जान कियो बनाया संसार
हर बुत में दी जान कियो बनाया यह संसार
कियो ये नज़ारे बनाये कियो दिखाया इन्हें नजरो से
कियो ये बुत बनाये सांसे दे कर चलने को
कियो ये जबान दी इस दर्द को कहिने को
कियो दर्द दिया इस बुत में सहने को
किया रहम नहीं आया इतना करने पर
कि दे दिया पेट इस बुत में लरने को
वाह ईश्वर वाह कियो बनाया यह संसार
हर बुत में दी जान कियो बनाया संसार
Saturday, September 25, 2010
kashish
कशिश है इन आँखों में कुछ पाने कि
कशिश है इन हाथो में कुछ छूने कि
कशिश है दिल से निकली आवाज़ होठो पर आने कि
कशिश है अपने अरमान बरसो से पूरे करने कि
कशिश है दो जवान दिलो के दिल मिलाने कि
कि बरसो से जगी आग अब मिटाने कि
कशिश है इन हाथो में कुछ छूने कि
कशिश है दिल से निकली आवाज़ होठो पर आने कि
कशिश है अपने अरमान बरसो से पूरे करने कि
कशिश है दो जवान दिलो के दिल मिलाने कि
कि बरसो से जगी आग अब मिटाने कि
subah
अजीब सी पहेली है यह जिंदगी
कुछ पास कुछ दूर है ये जिंदगी
कियो कर में इस को उल्जाऊ
कि बहुत प्यारी है ये जिंदगी
उजली सी किरण है ये सुबह
कि प्यार कि इक दिन और
कि कहती है सदा मुझसे
न दूर रहना कभी अपने प्यार से
कुछ पास कुछ दूर है ये जिंदगी
कियो कर में इस को उल्जाऊ
कि बहुत प्यारी है ये जिंदगी
उजली सी किरण है ये सुबह
कि प्यार कि इक दिन और
कि कहती है सदा मुझसे
न दूर रहना कभी अपने प्यार से
Wednesday, September 22, 2010
pyar
तुम निगाओ से दूर हो दिल से नहीं
तुम लबो से दूर हो लेखन से नहीं
तुम रूबरू नहीं तो किया खियालो से दूर नहीं
तुम रातो को पास नहीं पर ख्वाबो में रात भर हो
तुम न दूर रह पाहोगी कभी इस जिगर से कभी
कि तुम कि तुम रहती हो सदा इन सांसो में सदा
तुम लबो से दूर हो लेखन से नहीं
तुम रूबरू नहीं तो किया खियालो से दूर नहीं
तुम रातो को पास नहीं पर ख्वाबो में रात भर हो
तुम न दूर रह पाहोगी कभी इस जिगर से कभी
कि तुम कि तुम रहती हो सदा इन सांसो में सदा
Monday, September 20, 2010
sach
कैसे कहू कि तुम अब वो नहीं जो पहले थी
कैसे कहू कि तुम्हारी निगाहे कुछ और कहती है
कैसे कहू कि तुमारे कदम थिरक गए है
कैसे कहू कि तुमारी चाल कुछ और कहती है
कैसे कहू कि यह मुस्कराना कुछ और बया करता है
कैसे कहू कि तुमारी हसी भुझी भुझी सी लगती है
कैसे कहू कि आ गले लग के बयां कर दे सचाई
कि तुम वोही हो ,तुम वोही हो ,तुम वोही हो .
कैसे कहू कि तुम्हारी निगाहे कुछ और कहती है
कैसे कहू कि तुमारे कदम थिरक गए है
कैसे कहू कि तुमारी चाल कुछ और कहती है
कैसे कहू कि यह मुस्कराना कुछ और बया करता है
कैसे कहू कि तुमारी हसी भुझी भुझी सी लगती है
कैसे कहू कि आ गले लग के बयां कर दे सचाई
कि तुम वोही हो ,तुम वोही हो ,तुम वोही हो .
Friday, September 17, 2010
khwab
ये रात ऐसी होगी न सोचा था कभी
कि बगल में होंगी उनकी सांसे कभी
पास रह कर भी कियो लगता है दूर मुझे
कि केवल वोह है कि केवल वोह है पास मेरे
कि खियाल है कि हकीकत है पास मेरे
कि डर लगता है अब हकीकत से मुझे
कि छूकर कही ख्वाब टूट न जाये
कि सुंदर पल छटक न जाये
कि अब तो कामना है इसे छूने कि
छूकर करुगा रोशन दुनिया ख्वाबो कि
कि बगल में होंगी उनकी सांसे कभी
पास रह कर भी कियो लगता है दूर मुझे
कि केवल वोह है कि केवल वोह है पास मेरे
कि खियाल है कि हकीकत है पास मेरे
कि डर लगता है अब हकीकत से मुझे
कि छूकर कही ख्वाब टूट न जाये
कि सुंदर पल छटक न जाये
कि अब तो कामना है इसे छूने कि
छूकर करुगा रोशन दुनिया ख्वाबो कि
Wednesday, September 15, 2010
glimpse: ankhe
glimpse: ankhe: "तुम रोज़ कियो इतना पीते हो, पीकर गिर परते हो किया तुमने सोचा है कभी कि इसे तुम पीते हो या ये तुमे पीती है पीने को और बहुत है इस दुनिया म..."
ankhe
तुम रोज़ कियो इतना पीते हो, पीकर गिर परते हो
किया तुमने सोचा है कभी कि इसे तुम पीते हो या ये तुमे पीती है
पीने को और बहुत है इस दुनिया में, कियो इक ज़हर पीते हो शाम होने को
शाम तो रंगी और खुशनुमा होती है ,कियो नहीं पीते इन मद भरी आँखों से
मदहोश रहती है ये आँखे हमेशा कुछ पाने को ,कि शाम हुई है पाने को
अह दोस्त न पीना दूर उस ज़हर भरे प्याले को ,कि अमृत भरा है इन दो पास भरे प्यालो में
किया तुमने सोचा है कभी कि इसे तुम पीते हो या ये तुमे पीती है
पीने को और बहुत है इस दुनिया में, कियो इक ज़हर पीते हो शाम होने को
शाम तो रंगी और खुशनुमा होती है ,कियो नहीं पीते इन मद भरी आँखों से
मदहोश रहती है ये आँखे हमेशा कुछ पाने को ,कि शाम हुई है पाने को
अह दोस्त न पीना दूर उस ज़हर भरे प्याले को ,कि अमृत भरा है इन दो पास भरे प्यालो में
Tuesday, September 14, 2010
paheli
तुम इक अजीब पहेली हो इस जीवन में
लगता है इक घनघोर घटा हो जीवन में
कब बरसोगी मालूम नहीं है मुझे बरसो से
कब भर दोगी दामन छाल्कागे पैमाने से
अरे अब तो जीवन कि शाम आने को है
कि कब बंद होगी ये आँखे इस पैमाने में
Monday, September 6, 2010
barsat
कह दो इन सितारों को कि इस तरह आया न करे
कि अभी वक्त नहीं है उनके निकलने का
कि अभी तक बरसे नहीं थे भरपूर बदरिया ऊपर से
कि अभी तक नहीं प्यास बुझी इस धरती कि
बहुत आस लगाय बैठी है धरती बदरिया से
कि नहीं बरसी है बदरिया पुरे मन से
कि भाहे पसार बैठी है धरती बरसो से
कि कब आकर गले लगती है बदरिया मुझसे
कि अभी वक्त नहीं है उनके निकलने का
कि अभी तक बरसे नहीं थे भरपूर बदरिया ऊपर से
कि अभी तक नहीं प्यास बुझी इस धरती कि
बहुत आस लगाय बैठी है धरती बदरिया से
कि नहीं बरसी है बदरिया पुरे मन से
कि भाहे पसार बैठी है धरती बरसो से
कि कब आकर गले लगती है बदरिया मुझसे
Saturday, September 4, 2010
nazare
कितनी न हसी है यह जिंदगी
हर और हसीं नज़ारे नज़र आते है
हर शाख लहरा रही अपनी धुन में
कि उसे भी चाहत है इन नजारो कि
ओंस कि इन बूंदों के क्या कहने
वोह तो इतरा रही है पतों से लिपट कर
खुशबू से सारोबार किया है इन मदहोश फूलो ने
कि अब वोह कली से फूल बने है बगीचे में
ऐ दोस्त जरा सम्बल कर चलना इन बगीचों में
नाज़ुक है बहुत ये फूल जो सहर में बने है कली से
हर और हसीं नज़ारे नज़र आते है
हर शाख लहरा रही अपनी धुन में
कि उसे भी चाहत है इन नजारो कि
ओंस कि इन बूंदों के क्या कहने
वोह तो इतरा रही है पतों से लिपट कर
खुशबू से सारोबार किया है इन मदहोश फूलो ने
कि अब वोह कली से फूल बने है बगीचे में
ऐ दोस्त जरा सम्बल कर चलना इन बगीचों में
नाज़ुक है बहुत ये फूल जो सहर में बने है कली से
Sunday, August 29, 2010
aadmi
लूटता है आदमी को आदमी ,घर आदमी का जलाता है आदमी
जान लेता है आदमी कि आदमी ,खून आदमी का बहाता है आदमी
कितना बेबस है फिर भी ,हाथ खाली जाता है आदमी
इतना खुदगर्ज़ है कि कागज़ के टुक्रो पर बिक जाता है आदमी
नीलाम करता है अपने खुद का जमीर ,खुद ही अपनी बोली लगता है आदमी
कितना बेबस है फिर भी खाली हाथ जाता है आदमी
करता है फरेब अपनों से ,लहू अपनों का बहाता है आदमी
शोहरत कि होढ में ,नाम कितना मिटाता है आदमी
कितना बेबस है फिर भी खाली हाथ जाता है आदमी
दर्द कितना सहता है ,कितने गम उठता है आदमी
बुझा कर रात रहते ही चिराग ,रौशनी कल के लिए बचाता है आदमी
कितना बेबस है फिर भी खाली हाथ जाता है आदमी
चार दिन कि जिंदगी में आराम का हर सामान जुटाता है आदमी
कितना बेबस है फिर भी खाली हाथ जाता है आदमी
जान लेता है आदमी कि आदमी ,खून आदमी का बहाता है आदमी
कितना बेबस है फिर भी ,हाथ खाली जाता है आदमी
इतना खुदगर्ज़ है कि कागज़ के टुक्रो पर बिक जाता है आदमी
नीलाम करता है अपने खुद का जमीर ,खुद ही अपनी बोली लगता है आदमी
कितना बेबस है फिर भी खाली हाथ जाता है आदमी
करता है फरेब अपनों से ,लहू अपनों का बहाता है आदमी
शोहरत कि होढ में ,नाम कितना मिटाता है आदमी
कितना बेबस है फिर भी खाली हाथ जाता है आदमी
दर्द कितना सहता है ,कितने गम उठता है आदमी
बुझा कर रात रहते ही चिराग ,रौशनी कल के लिए बचाता है आदमी
कितना बेबस है फिर भी खाली हाथ जाता है आदमी
चार दिन कि जिंदगी में आराम का हर सामान जुटाता है आदमी
कितना बेबस है फिर भी खाली हाथ जाता है आदमी
yade
रात का भी अजब आलम होता है
देख तारो को यादे छाही रहती है
मदहोश कर देती है उनकी आहट पर
कि वोह नहीं केवल कल्पना है उनकी
क्या होगा जब रूबरू होंगे उनसे
यह सोच पसीने पसीने होई जाते है
या खुदा ये ख्वाइश है अब मेरी
कि उनकी यादो में ही खोही रहू जीवन भर
देख तारो को यादे छाही रहती है
मदहोश कर देती है उनकी आहट पर
कि वोह नहीं केवल कल्पना है उनकी
क्या होगा जब रूबरू होंगे उनसे
यह सोच पसीने पसीने होई जाते है
या खुदा ये ख्वाइश है अब मेरी
कि उनकी यादो में ही खोही रहू जीवन भर
khwab
आशा इक किरण है जिदगी कि
आशा इक खुबसूरत ख्वाब है
आशा जीने कि चाहत है जिंदगी
कि जिंदगी इक खुबसूरत लम्हा है हर पल
कि आनंद और मज़ा है इन ख्वाबो में
कि आशा इक खुबसूरत ख्वाब है
क्या कभी पूछा है ख्वाबो से जी भर कर
कि कब हसी बन कर गले लगगे मुझ से
आयेगे जरूर आयेगे मुझे गले लगाने
कि स्वागत में आँखे बिछाए द्वार खरी हु में
आशा इक खुबसूरत ख्वाब है
आशा जीने कि चाहत है जिंदगी
कि जिंदगी इक खुबसूरत लम्हा है हर पल
कि आनंद और मज़ा है इन ख्वाबो में
कि आशा इक खुबसूरत ख्वाब है
क्या कभी पूछा है ख्वाबो से जी भर कर
कि कब हसी बन कर गले लगगे मुझ से
आयेगे जरूर आयेगे मुझे गले लगाने
कि स्वागत में आँखे बिछाए द्वार खरी हु में
Saturday, August 28, 2010
pyar
ये माना कि तुम जीवन संगनी हो
ये माना कि तुम मेरी अर्धांग्नी हो
ये माना कि तुम मेरी जीवन सफ़र हो
ये माना कि तुम मेरी अमिट मित्र हो
ये माना कि यह सुहाना सफ़र है
ये माना कि हम साइकिल के दो पहिये है
पर तुम मानों यह बात जीवन भर
कि हम इक दुसरे के लिए जन्मे है
ये माना कि तुम मेरी अर्धांग्नी हो
ये माना कि तुम मेरी जीवन सफ़र हो
ये माना कि तुम मेरी अमिट मित्र हो
ये माना कि यह सुहाना सफ़र है
ये माना कि हम साइकिल के दो पहिये है
पर तुम मानों यह बात जीवन भर
कि हम इक दुसरे के लिए जन्मे है
Thursday, August 26, 2010
pyar
तुम मेरे प्यार हो इस जीवन के पतवार हो
नहीं चलेगी अकेले यह जीवन कि रस भरी नैया
नहीं चाहिए मुझे कुछ और तुमरे सिवाह
कि तुम्ही हो मेरे सब कुछ खेवनहार पिया
सब कुछ मिला है मुझे इक तुम्हे पाकर पिया
अब और नहीं इच्छा इस परवरदिगार से पाने कि
नहीं चलेगी अकेले यह जीवन कि रस भरी नैया
नहीं चाहिए मुझे कुछ और तुमरे सिवाह
कि तुम्ही हो मेरे सब कुछ खेवनहार पिया
सब कुछ मिला है मुझे इक तुम्हे पाकर पिया
अब और नहीं इच्छा इस परवरदिगार से पाने कि
Sunday, August 22, 2010
pyar
तुम से जीना सीख लिया
तुम से मरना सीख लिया
न अब कोही गम दुनिया से
कि अब मर जिह कर देख लिया
यह सच है तुम प्यार से प्यारी हो
यह सच है तुम जान हमारी हो
पर न सिखाया हमको दूर जाने को
न रहोगे तुम अगर मर जायेंगे हम
तुम से मरना सीख लिया
न अब कोही गम दुनिया से
कि अब मर जिह कर देख लिया
यह सच है तुम प्यार से प्यारी हो
यह सच है तुम जान हमारी हो
पर न सिखाया हमको दूर जाने को
न रहोगे तुम अगर मर जायेंगे हम
jadu
उसकी आँखों में वो जादू है
करती है बेहोश सभी को
अगर होश में रहे मदहोश लगते है
न होश रहे कुछ करने को
तुम्हे वास्ता है खुदा का
न देख यु जी भर कर सभी को
कि देखने वाले लाइन में लगे है
यु मिट कर मरने वालो में
करती है बेहोश सभी को
अगर होश में रहे मदहोश लगते है
न होश रहे कुछ करने को
तुम्हे वास्ता है खुदा का
न देख यु जी भर कर सभी को
कि देखने वाले लाइन में लगे है
यु मिट कर मरने वालो में
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