Thursday, December 15, 2011

tohmat

क्यों आती है याद उनकी रह रह कर
जब टूट गए रिश्ते पल भर में उनके हम से

न सोचा  था कभी हमने कि इस तरह के दिन आयेंगे कभी
क्या क्या न अरमान सजाये थे हमने इस दिल में रह रह के

ये तोहमत बेवफा कि जलाती है इस दिल को रह रह कर
कि वफ़ा के नाम से दुनिया को दूर किया है हमने जल जल का








Friday, November 25, 2011

subah


क्यों आती है यह सुबह रोज़
क्यों खिलते है ये फूल रोज़
क्यों खिलते है नए पत्ते रोज़
आती है फिर ओंस रोज़ सुबह
हां फिर खुलती है नींद रोज़ सुबह
की सूर्य जगाता है नए नूतन दिन में
की देता है सन्देश कुछ नया करने को
की काली अँधेरी रात गई भाग अब
की कुदरत ने छटा बिखेरी है प्यार की
की लहरा रही है फसल झूम झूम कर
की प्यार कर की प्यार कर

Monday, November 21, 2011

insaan

अथाह सागर है भरा हुआ है किद्विन्तियो से
किधर से करे शुरुआत करे  हकीक़तो के कोने से

अजीब है यह जानना कि कैसा था इंसान
शुरू के धरती के इन कुदरत के इन विरानो में

है अजीब खेल ये धरती पर इश्वर के अगिनित खेलोs में
कि कठपुतली  बना के भेजा मिटी के इस मानव को

कि मजे लेता है रोज़ इन्सान के अध्बुद करतबों के
कही लड़ता है कही करता है प्यार वो मिटी के पुतलो से

करता है ये खेल जिंदगी भर इन खुबसूरत नजारों में
कि जब तक बंधी है यह डोर सांस कि इस मिटी के पुतले में

Wednesday, October 26, 2011

insaan

वाह मालिक अजब तेरी दुनिया
न रिश्ते है न प्यार है ,केवल दिखावा है

अगर प्यार नहीं तो ये दिखावा क्यों
क्यों कमजौर है इतना इंसान जहाँ में

है अंदर में कुछ और बाहर कुछ और
क्यों सोच अलग है सच कहने से

इससे अच्छा है रहे दूर वो न आये पास कभी
कमसे कम यह तो रहेगा कि है इक इन्सान अपना दूर कही

Sunday, October 16, 2011

dil

क्यों कर आखिर समजाऊ इस दिल को बार बार
क्यों भटकता है आखिर दिल बार बार समजने को

ये दर्द की दुनिया है समेटे हर इक दर्द पिलाने को
कहाँ तक इंसान सहेगा इस बेदर्द ज़माने को

रहम कर ऐ खुदा इस बन्दे पर रहने को इस ज़माने में
कि भेजा है आखिर आपने इस बन्दे को ज़ालिम ज़माने में

pyar

कभी कभी अजीब सा लगता है
कभी कभी खुबसूरत लगता है

कभी कभी मन को लुबाने लगता है
कभी कभी मन को उचकाने लगता है

पूछोगे नहीं आखिर है क्या ये कभी कभी ?
हां हुजुर यह प्यार है ,इक अहसास है .

ये सच है कुछ नहीं है इस जहाँ में बिन प्यार के
छलावा लगती है ये दुनिया बिन प्यार के जीने में


Saturday, October 15, 2011

mohbbat

कभी महसूस होता है अकेला हु ,कभी महसूस होता है सब साथ है
कैसी ये उलझन है ,कैसी ये बेचेनी है ,लगता है पीछे रह गया हु सबसे

क्यों होता है इंसान खफा सबसे ,कही यह तो नहीं खफा है अपने से
लिखा है सब किताबो में कि प्यार सबसे ऊपर है इस जहाँ में ,पर है कहाँ

मोहब्बत ,प्यार ,इश्क मरना ,मिटना ,है सब किताबो कि दुनिया इस जहाँ में
है और भी बहुत काम इस जहाँ में ,कि नहीं है सिर्फ मोहब्बत इस जहाँ में

अफसाने  बनते है बिगरते है इस जहाँ में रोज़ कि किस्से रह जाते है यादों में
कि खुश रह ऐ दोस्त इस जहाँ में ,कि नहीं है सिर्फ मोहब्बत इस जहाँ में

Sunday, September 25, 2011

love

ये रात की तन्हाई अजब सा अहसास कराती है
कुछ भूली हुई यादे रह रह कर जागुर्त हो उठती है

आँखों की नींद लगती  है कोसो दूर इन आँखों में
उभर उठते है वो खुबसूरत चित्र रह रह कर इन आँखों में

कि मन नहीं भूलता वो तनहा खुबसूरत प्यार का मंज़र
कि तब वो थे और उनके प्यार के लाजवाब कहकहे

कि घंटो बीत जाते थे सिर रख कर उनकी गोदी में
हां वो प्यार था एक अहसास था उन खुबसूरत पलो का

आखिर क्योकर भूले हम उनको ,कहा गए वो पल प्यार के
कि न रही वो खुबसूरत राते ,कि न रहे उनके कहकहे .

morning

जी भर कर नमन है बसंत की इस प्रभात वेला को
रिम जिम बुँदे टपक रही है रह रह कर पावन धरती पर

हां अब टहनिया लहरा रही है मंद मंद समर के साथ
ऐसे  झूल रही है लदे महकते गुलाब के  घुछो के साथ

चंदा भी शर्मा रहा है देख देख कर महकते गुलाब को
कि हो  जाना है उसे अब ओजल कि आने को है उजाला

लाली गुलाब कि छिरक आही है कि आगमन उजाले का
कि सूर्य दर्शन को है तेयार जग में अंधियारे के बाद

कोटि कोटि नमन है सूर्य को जग में उजियारे के साथ
कि है शुरुआत  जग में नए दिन कि उजियारे के साथ

Saturday, September 24, 2011

julfe

जुल्फे है या गुलाब की पंखरिया
लहराती है कही छू छू कर गालो को

क्या ये अदा है या अंदाज़ खुबसूरत चेहरे का
या है एक लहर इस मतवाले जिस्म  का

क्योकर न इतराए कोही अन्दाज़ा बया कर
कि ख़ामोशी बताती है अपना अंदाज़ कुछ और

कि दूर रहना ऐ मनचले इन आग कि लपटों से
कि कांटे भी साथ है इन गुलाब कि पंखुरियो में

Monday, September 19, 2011

ये नयन तेरे मतवाले लगे भरपूर मद के प्याले
डुबोए है सब को कर कर मदहोश नयन ये प्यारे

क्यों ये हुस्न दिया  खुदा ने इन मध् भरे नैनो वाली को
कि करती है बेहोश सढ़को पर अपने हुस्न के दीवानों को

ठुमक ठुमक चलती है ये सढ़को पर कि गिरते है दीवाने सढ़को पर
कि मुढ़ मुढ़ कर देखते है इन्हें हर उम्र के परवाने इन्हें

रहम कर हे खुदा इस बन्दे पर कि दाग न लगे इस जिस्म पर
कि बहुत जतन से पाई है ये दौलत इज्ज़त कि बरसो खिदमत के बाद

Saturday, September 3, 2011

saawan

मंद मंद समीर है ,अंदाज़ मौसम का कुछ और है
बादल गरज गरज कर कह रहे है ,जैसे अपने होने का अहसास करा रहे है

फूलो की डालिया झूम झूम कर इतरा रही है ,नन्ही कलियाँ खामोश है
खिले फूल इंतज़ार मै है शायद लेने आगोश में कि किसी प्रियतम  को

खुशबू बिखेर दी है गुलाब ने सब और कि झूम उठा है हर कोही सब और
हां भाई हां बरस परी है अब काली घटाए सब और कि नाच उठा है सावन सब और .

Wednesday, July 27, 2011

pyaar

ये हकीक़त है या ख्वाब या एक अहसास
झलक है उसकी या एक मुर्ग्त्रिश्ना रेतो की

ये मुस्कराना और जुल्फों का लहराना मस्त हवा के झोंको में
दुपट्टा उरता है कही तो नज़रे निहारती है कही ,लगता है मन है कही

हां यह न  ख्वाब न मृगतृष्णा  यह एक हकीक़त है प्यार के इकरार की
हां    क्यों न नाचे मन झूम झूम कर क़ि मिल गया है एक तोहफा प्यार का

Saturday, July 23, 2011

rahmat khuda ki

बरसात के बाद खिली हुई धूप मौसम को निखार देती है
ऐसे लगता है जैसे चारो और चांदनी सिमट कर धरती पर आई है

पक्षियों की चहचहाहट और कोयल की कु कु व्यक्ति को सहज आकर्षित करती है
मखमली सी हरी घास ,झरनों का संगीत फूलो की खुशबू की घटा निराली है

क्यों नहीं मन नाचे हिलोर हिलोर क्यों नहीं स्वर निकले झूम झूम कर
कि  बरसी है रहमत इस परवरदिगार की इन कोमल अंगो पर

Saturday, July 16, 2011

barsat

kitna pyaara mousam hai barsaat ka
rimzim si baarish apne aap me ek nazara hai kudrat ka

Thursday, July 14, 2011

song

kindly watch this vedio a old famous song played by vyjantimala .

Saturday, July 2, 2011

khwab

इक आहट सी होती है सुनसान और खामोश रात में
आकृति सी नज़र आती है इन झुरमुट पेढ़ो के अँधेरे में

सहसा मन बोझुल  हो उठता है पुरानी यादो में
की याद आ जाता है वो मंज़र बरसो पुरानी रातो का

कि रोज़ वो राते होती थी इंतज़ार  में किसी के प्यार के दीदार में  
हां वो आती थी जरुर आती थी नींद के बाद "ख्वाबो "में

आखिर पुरे हुए ख्वाब बरसो नींद के बाद कि नज़र आई वो दूर से निगाहों में
सचमे अचरस था मेरी आँखों में कि बार बार मलता रहा में आँखों को हकीक़त है या खुवाब

नाच उठा में अपने में कि हकीक़त है इन आँखों में कि न था अपने बस में
खुशियों में नाचा इतना ही पल भर में सब कुछ ओझल हुआ इन आँखों में .


Sunday, June 26, 2011

pyaar

कितने अजीब ख्याल है इस समाज के
सिर्फ अपने रिवाज़ है इस समाज के
कुछ ख्याल नहीं है इस नहीं पीढ़ी का
क्या उन्हें हक नहीं है अपने हिसाब से जीने का

माना उन्हें तजुर्बा है जिंदगी जीने का
पर वो क्यों भूल गए है नयी खुशियों को
कि ख़ुशी बाटने से मिलती है खुशियाँ
कि प्यार है इस दुनिया में रोशन अभी

कि नहीं रोकना चाहिए किसी कि खुशियों को
कि हर जगह बसता है  हर दिल में ईश्वर सभी के
दो खुशिया लो खुशिया है यह दस्तूर दुनिया का
कि प्यार से रोशन है दस्तूर दुनिया का

Sunday, May 29, 2011

pyaar

ढाई अक्षरों का शब्द प्यार  हां भाई प्यार
समेटे है अपने में असंख्य शब्दों का भंडार

कहियो को समझने में लग जाते है दिन हज़ार
कहियो को दिन दो चार और समझदार को मिनट चार

वह री ईश्वर तेरी लीला अपरम्पार ,समझे हम बार बार
कि नहीं मिलता मुफ्त में प्यार ,कि नहीं है यह शब्दों का संसार

कि नहीं होती भक्ति भूख में ,नहीं मिलता प्यार मुफ्त में
आखिर क्यों बनाई ,क्यों बनाई ,दुनिया मुफ्त में भगवान्

Sunday, May 8, 2011

maa

बहुत याद आती है आज मेरी प्यारी मा
वो माँ जिसने प्यार और संभाल के रखा मुझे अपनी कोख में
वो माँ जिसने प्यार से चलना और बोलना सिखाया इस धरती पर
वो माँ जिसने बतलाया दुनिया के रंग और उसके सुरों को
वो माँ जिसने जिसने रखा हर पल अपनी गोद में दुलार के
वो माँ जिसने संभाल रखी हर मौसम की दूप छाव की बनते बिगारते हालात की
वो माँ जिसने बहुत प्यार से सुलाया हर रात मुझे अपने सीने से लगा कर
कितनी अनगिनत बाते बचपन की और उस दुलार की उस ममता भरी  आवाज़ की
कह़ा गयी वो माँ ,कह़ा गयी वो माँ मुझे छोर कर इस झंझाल में
क्या अब वो ममता ना रही उम्र के इस पराव में ,क्या वो ख़ुशी ना रही इस खून के कतरे में
नहीं नहीं यह गलत है वो माँ है ,वो नहीं रह सकती दूर मुझसे ,वो दूर से निहार रही है हर पल मुझको ,हां वो दुहाई दे रही है हर पल मुझको वो मेरे पास है वो मेरे पास है हर पल हर घरी .

Friday, April 22, 2011

kudrat

सुबह का समय प्रकृति का  निराला अंदाज़ है
पक्षियों की चहचहाहट वातावरण को और मोहक बना देती है

कानो में कौयल की कु कु मधुर रस से सरोबार कर देती है
सहसा मन व्याकुल हो उठता है उसे निहारने को

हरे घास पर ओंस की बुँदे अपनी अलग ही छटा बिखेरती है
सहसा मन स्वयं ही पाँव रखने को थिरक कर खिचा चला जाता है

तभी अचानक मस्त हवा के झोंके ने दामन में सिरहन कर दी
तब यह अहसास हुआ कि में सुबह के सुहावने मौसम में कुदरत के साथ हु

तबी बहुत ही कुर्बत से जबान से शब्द निकले "कि वाह मालिक वाह "
क्या तुमने दुनिया बनाई कि बार बार सजदा करने को जी करता है

Monday, April 4, 2011

insaan

आखिर क्यों ये जहाँ बसाया तुमने मालिक
इक कठपुतली बना के भेजा इस जहाँ में

क्यों बनाये तुमने इतने बागबगीचे इस धरती पर
पर नहीं जगह दी इस इंसान को चैन कि नींद लेने को

क्यों बनाये ये महल और ये सुंदर इमारते इस धरती पर
पर नहीं जगह दी इसमें दो पल मुह छुपाने को

क्या देख कर इंसान जी सकेगा उम्र भर इस धरती पर
क्या भूख अपने तन कि और मन कि मिटा पायेगा इस धरती पर

आखिर क्यों ये जहाँ बसाया तुमने मालिक
इक कठपुतली बना के भेजा इस जहाँ में  

Sunday, April 3, 2011

mahak

यह महक है किसी के सुंदर बालो की
यह महक है किसी के सुंदर दामन की
यह महक है किसी के सुरीले होठो की
यह महक है किसी के  सुंदर कदमो की

हां हां अवश्य वो नज़दीक है मेरे दामन के
हां हां अवश्य दस्तक दी है किसी ने मेरे ख्यालो  को
हां हां अवश्य दखल दी है किसी ने मेरे सिरहाने को
हां हां यह हकीकत है ,नहीं है ख्वाब किसी अपने का

Friday, March 25, 2011

pyaar

तुम क्या जानो प्यार क्या है ,तकरार क्या है
तुम क्या जानो रूठना क्या है ,मनाना क्या है

तुम क्या जानो इन आँखों की भाषा को
तुम क्या जानो इस ऊपर नीचे होती पलकों को

तुम क्या जानो इन चेहरे के भावों को
तुम क्या जानो इन लहराती इन रेशमी बालो  की जुल्फों को

क्या कहती है आखिर ये सब अपनी भाषा में
हां हां यही है प्यार की भाषा पहले प्यार की


Thursday, March 24, 2011

एक अजीब सी प्यास है इस मन में
एक अजीब सी आस है इस तन में

कि जानू में इस प्यार  को अंदर से इन तारो को
कि कैसे बजते है तार इसके मन कि वीराः में

कि जानू क्यों ढोल उठता है मन थिरक के पावों से
कि जानू क्यों सिरहन सी उठती है अंदर के भावों में

कि जानू क्यों मचल उठता है जी निहारने को उनको
कि जानू क्या यह जादू है  या एक अजीब पहेली है

एक अजीब  सी प्यास है इस मन में
एक अजीब सी प्यास है इस तन में

Saturday, March 19, 2011

pyar ke rang

धरती रंगी है आज सभी रंगों में
की आज खिले है फूल धरती पर

मन के फूल खिले है हर अंगो में
की योवन जाग  उठा है अंग अंग में

की ख़ुशी रह रह के फूट उठी है हर अंग से
की योवन जाग  उठा है धरती के कण कण में

खुशियों से सरोबार है हर उम्र के सब लोग
की धरती पर उतर आया है स्वर्ग एक बार फिर

की धरती रंगी  है आज रंगों में
की खिले है आज फूल धरती पर

Thursday, February 24, 2011

raat

रात की ख़ामोशी भी अपने आप में बहुत छुपाये हुए है
क्या क्या न घटता है इस रात के अँधेरे में
कुछ दिखता है कुछ नहीं दिखता है ,कोही करता है ,कोही सोचता है
किसी के लिए ये रात काली है ,तो किसी के लिए भरपूर खजाना है

पूरी काइनात में ये रोज़ अपनी दस्तक देती है
किसी को  इंतज़ार रहता है ,तो कोही परेशां होता है
आखिर क्योकर होता है यह सब हर रात को
क्या दिन के उजाले से डरते है ये सब लोग

ऐ मालिक क्यों बनाई यह खामोश और भयानक रात हर रोज़
माना हर रोज़ सुबह भी आती है हर कही रात के बाद
पर वो कहा  सुहानी सुबह जो बदल के रख दे काली रात का समा
पर लगता है आपका भी पूरा सहयोग है इस काली रात में .

Wednesday, January 19, 2011

rupya

ख़ामोशी का भी अपना महत्व होता है
इक आहट होती है शांत चेहरे पे

पर क्यों कर बोले कोही बेवजय इस सुंदर जुबा से
कि वजय नहीं दिखती इन बेवक्त खियालो कि

वोह कहा है वो ईमान इन देश के प्यारो में
कि दस लिया है इनको रुपयों के झंकारो ने

Wednesday, January 12, 2011

budhdi

अजीब चीज बनाई है विधाता ने इंसान                          
दे दिए है हज़ार ग़म दिल और दिमाग में

कहते है बुध्दी दी है सब जीवो से  बढ़कर
क्या शान्ति दी इस बुध्दी ने इस इंसान को

कपट ,झूठ ,लढ़ाई बढ़ दी इस zaalim  बुध्दी में
कहते है बुध्दी दी है सब जीवो से बढ़कर