Friday, April 22, 2011

kudrat

सुबह का समय प्रकृति का  निराला अंदाज़ है
पक्षियों की चहचहाहट वातावरण को और मोहक बना देती है

कानो में कौयल की कु कु मधुर रस से सरोबार कर देती है
सहसा मन व्याकुल हो उठता है उसे निहारने को

हरे घास पर ओंस की बुँदे अपनी अलग ही छटा बिखेरती है
सहसा मन स्वयं ही पाँव रखने को थिरक कर खिचा चला जाता है

तभी अचानक मस्त हवा के झोंके ने दामन में सिरहन कर दी
तब यह अहसास हुआ कि में सुबह के सुहावने मौसम में कुदरत के साथ हु

तबी बहुत ही कुर्बत से जबान से शब्द निकले "कि वाह मालिक वाह "
क्या तुमने दुनिया बनाई कि बार बार सजदा करने को जी करता है

Monday, April 4, 2011

insaan

आखिर क्यों ये जहाँ बसाया तुमने मालिक
इक कठपुतली बना के भेजा इस जहाँ में

क्यों बनाये तुमने इतने बागबगीचे इस धरती पर
पर नहीं जगह दी इस इंसान को चैन कि नींद लेने को

क्यों बनाये ये महल और ये सुंदर इमारते इस धरती पर
पर नहीं जगह दी इसमें दो पल मुह छुपाने को

क्या देख कर इंसान जी सकेगा उम्र भर इस धरती पर
क्या भूख अपने तन कि और मन कि मिटा पायेगा इस धरती पर

आखिर क्यों ये जहाँ बसाया तुमने मालिक
इक कठपुतली बना के भेजा इस जहाँ में  

Sunday, April 3, 2011

mahak

यह महक है किसी के सुंदर बालो की
यह महक है किसी के सुंदर दामन की
यह महक है किसी के सुरीले होठो की
यह महक है किसी के  सुंदर कदमो की

हां हां अवश्य वो नज़दीक है मेरे दामन के
हां हां अवश्य दस्तक दी है किसी ने मेरे ख्यालो  को
हां हां अवश्य दखल दी है किसी ने मेरे सिरहाने को
हां हां यह हकीकत है ,नहीं है ख्वाब किसी अपने का