Tuesday, September 28, 2010

ahsas

ऐसा क्यों  लगता है कि वोह न आएगा कभी
ऐसा क्यों  लगता है कि प्यार छुट गया मुझसे

क्या  यह अहसास है सच का या धुंधले खियालो का
क्या यह अहसास है उन सुंदर बिताये पलो का

न भूल पाहुंगी उन प्यार भरे मोहक लम्हों  को
कि जीवन कि  अद्बुद भुझी उस प्यार के अहसास को

ऐ खुदा, ऐ परवरदिगार विनती है मेरी इन चरणों में
मिला दे इक बार मेरे बिछरे रूठे खेवनहार को

Monday, September 27, 2010

insaniet

कितना बदल गया है ये इन्सान कि भूल गया इन्सानिएत
न होश उसे चाहत का न होश उसे रिश्तो का, अपनेपन का

न याद उसे उस बचपन कि  न याद उसे उस बीते पलो कि
कि इन पलो पर कितनी प्यार से बिताई थी वो राते और दिन

दूर खंडर सी  नज़र आती  है वो आराम देती वो छत और ईटे
कहा है वो बाग़ और बगीचे जिस में खाए थे खूब शहतूत घनेरे

कहा है वोह बहिन भाई जो थे साथ हर समय हर दुःख सुख में
कहा गयी माँ कि प्यारी गोद और पिता कि प्यार भरी भाए

न दूंड अह दोस्त ये सब कि सब गवा दिया तुमने इस रुपैये कि खातिर
कि सब कुछ लुट गया इस धरती से तुम्हारे इस रुपैये के खातिर

ishwar

वाह ईश्वर वाह कियू  बनाया यह संसार
हर बुत में दी जान कियो बनाया यह संसार

कियो ये नज़ारे बनाये कियो दिखाया इन्हें नजरो से
कियो ये बुत बनाये सांसे दे कर चलने को

कियो ये जबान दी इस दर्द को कहिने को
कियो दर्द दिया इस बुत में सहने को

किया रहम नहीं आया इतना करने पर
कि दे दिया पेट इस बुत में लरने को

वाह ईश्वर वाह कियो बनाया यह संसार
हर बुत में दी जान कियो बनाया संसार

Saturday, September 25, 2010

kashish

कशिश है इन आँखों में कुछ पाने कि
कशिश है इन हाथो में कुछ छूने कि

कशिश  है दिल से निकली आवाज़ होठो पर आने कि
कशिश है अपने अरमान बरसो से  पूरे करने कि

कशिश है दो जवान दिलो के दिल मिलाने कि
कि बरसो से जगी आग अब  मिटाने कि

subah

अजीब सी पहेली है यह जिंदगी
कुछ पास कुछ दूर है ये जिंदगी

कियो कर में इस को उल्जाऊ
कि बहुत प्यारी है ये जिंदगी

उजली सी किरण है ये सुबह
कि प्यार कि इक दिन और

कि कहती  है सदा मुझसे
न दूर रहना कभी अपने प्यार से

Wednesday, September 22, 2010

pyar

तुम निगाओ से दूर हो दिल से नहीं
तुम लबो  से दूर हो लेखन से नहीं

तुम रूबरू नहीं तो किया खियालो से दूर नहीं
तुम रातो को पास नहीं पर ख्वाबो में रात भर हो

तुम न दूर रह पाहोगी कभी इस जिगर से कभी
कि तुम कि तुम रहती हो सदा इन सांसो में सदा

Monday, September 20, 2010

sach

कैसे कहू कि तुम अब वो नहीं जो पहले थी
कैसे कहू कि तुम्हारी निगाहे कुछ और कहती है

कैसे कहू कि तुमारे कदम थिरक गए है
कैसे कहू कि तुमारी चाल कुछ और कहती है

कैसे कहू कि यह मुस्कराना कुछ और बया करता है
कैसे कहू कि तुमारी हसी भुझी भुझी सी लगती  है

कैसे कहू कि आ गले लग के बयां कर दे सचाई
कि तुम वोही हो ,तुम वोही हो ,तुम वोही हो .

Friday, September 17, 2010

khwab

ये रात ऐसी होगी न सोचा था कभी
कि बगल में होंगी उनकी सांसे कभी

पास रह कर भी कियो लगता है दूर मुझे
कि केवल वोह है कि केवल वोह है पास मेरे

कि खियाल है कि हकीकत है पास मेरे
कि डर लगता है अब हकीकत से मुझे

कि छूकर कही ख्वाब टूट न जाये
कि सुंदर पल छटक न जाये

कि अब तो कामना है इसे छूने कि
छूकर करुगा रोशन दुनिया ख्वाबो कि

Wednesday, September 15, 2010

glimpse: ankhe

glimpse: ankhe: "तुम रोज़ कियो इतना पीते हो, पीकर गिर परते हो किया तुमने सोचा है कभी कि इसे तुम पीते हो या ये तुमे पीती है पीने को और बहुत है इस दुनिया म..."

glimpse: paheli

glimpse: paheli: " तुम इक अजीब पहेली ..."

ankhe

तुम रोज़ कियो इतना पीते  हो, पीकर गिर परते हो
किया तुमने सोचा है कभी कि इसे तुम पीते हो या ये तुमे पीती है

पीने को और बहुत है इस दुनिया में, कियो इक ज़हर पीते हो शाम होने को
शाम तो रंगी और खुशनुमा होती है ,कियो नहीं पीते इन मद भरी आँखों से

मदहोश रहती है ये आँखे हमेशा कुछ पाने को ,कि शाम हुई है पाने को
अह दोस्त न पीना दूर  उस ज़हर भरे प्याले को ,कि अमृत भरा है इन दो पास भरे प्यालो में

Tuesday, September 14, 2010

paheli

                                                             






















                                      तुम इक अजीब पहेली हो इस जीवन में 
                                       लगता है इक घनघोर घटा हो जीवन में
                                   
                                      कब बरसोगी मालूम नहीं है मुझे बरसो से 
                                       कब भर दोगी दामन छाल्कागे पैमाने से
                             
                                     अरे अब तो जीवन कि शाम आने को है
                                     कि कब बंद होगी ये आँखे इस पैमाने में







                 

Monday, September 6, 2010

barsat

कह दो इन सितारों को कि इस तरह आया न करे 
कि अभी वक्त नहीं है उनके निकलने   का
कि अभी तक बरसे नहीं थे भरपूर बदरिया ऊपर से
कि अभी तक नहीं प्यास बुझी इस धरती कि

बहुत आस लगाय बैठी है धरती बदरिया से
कि नहीं बरसी है बदरिया पुरे मन से
कि भाहे पसार बैठी है धरती बरसो से
कि कब आकर गले लगती है बदरिया मुझसे

Saturday, September 4, 2010

nazare

कितनी न हसी है यह जिंदगी
हर और हसीं नज़ारे नज़र आते है

हर शाख लहरा रही अपनी धुन में
कि उसे भी चाहत है इन नजारो कि

ओंस कि इन बूंदों के क्या कहने
वोह तो इतरा रही है पतों से लिपट कर

खुशबू से सारोबार किया है इन मदहोश फूलो ने
कि अब वोह कली से फूल बने है बगीचे में

ऐ दोस्त जरा सम्बल कर चलना इन बगीचों में
नाज़ुक है बहुत ये फूल जो सहर में बने है कली से