Friday, April 22, 2011

kudrat

सुबह का समय प्रकृति का  निराला अंदाज़ है
पक्षियों की चहचहाहट वातावरण को और मोहक बना देती है

कानो में कौयल की कु कु मधुर रस से सरोबार कर देती है
सहसा मन व्याकुल हो उठता है उसे निहारने को

हरे घास पर ओंस की बुँदे अपनी अलग ही छटा बिखेरती है
सहसा मन स्वयं ही पाँव रखने को थिरक कर खिचा चला जाता है

तभी अचानक मस्त हवा के झोंके ने दामन में सिरहन कर दी
तब यह अहसास हुआ कि में सुबह के सुहावने मौसम में कुदरत के साथ हु

तबी बहुत ही कुर्बत से जबान से शब्द निकले "कि वाह मालिक वाह "
क्या तुमने दुनिया बनाई कि बार बार सजदा करने को जी करता है

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