इक आहट सी होती है सुनसान और खामोश रात में
आकृति सी नज़र आती है इन झुरमुट पेढ़ो के अँधेरे में
सहसा मन बोझुल हो उठता है पुरानी यादो में
की याद आ जाता है वो मंज़र बरसो पुरानी रातो का
कि रोज़ वो राते होती थी इंतज़ार में किसी के प्यार के दीदार में
हां वो आती थी जरुर आती थी नींद के बाद "ख्वाबो "में
आखिर पुरे हुए ख्वाब बरसो नींद के बाद कि नज़र आई वो दूर से निगाहों में
सचमे अचरस था मेरी आँखों में कि बार बार मलता रहा में आँखों को हकीक़त है या खुवाब
नाच उठा में अपने में कि हकीक़त है इन आँखों में कि न था अपने बस में
खुशियों में नाचा इतना ही पल भर में सब कुछ ओझल हुआ इन आँखों में .
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