Saturday, July 2, 2011

khwab

इक आहट सी होती है सुनसान और खामोश रात में
आकृति सी नज़र आती है इन झुरमुट पेढ़ो के अँधेरे में

सहसा मन बोझुल  हो उठता है पुरानी यादो में
की याद आ जाता है वो मंज़र बरसो पुरानी रातो का

कि रोज़ वो राते होती थी इंतज़ार  में किसी के प्यार के दीदार में  
हां वो आती थी जरुर आती थी नींद के बाद "ख्वाबो "में

आखिर पुरे हुए ख्वाब बरसो नींद के बाद कि नज़र आई वो दूर से निगाहों में
सचमे अचरस था मेरी आँखों में कि बार बार मलता रहा में आँखों को हकीक़त है या खुवाब

नाच उठा में अपने में कि हकीक़त है इन आँखों में कि न था अपने बस में
खुशियों में नाचा इतना ही पल भर में सब कुछ ओझल हुआ इन आँखों में .


No comments:

Post a Comment