Sunday, August 29, 2010

aadmi

लूटता है आदमी को आदमी ,घर आदमी का जलाता है आदमी
जान लेता है आदमी कि आदमी ,खून आदमी का बहाता है आदमी

कितना बेबस है फिर भी ,हाथ खाली जाता है आदमी
इतना खुदगर्ज़ है कि कागज़ के टुक्रो पर बिक जाता है आदमी

नीलाम करता है अपने खुद का जमीर ,खुद ही अपनी बोली लगता है आदमी
     कितना बेबस है फिर भी खाली हाथ जाता है आदमी

करता है फरेब अपनों से ,लहू अपनों का बहाता है आदमी
शोहरत कि होढ में ,नाम कितना मिटाता है आदमी
   कितना बेबस है फिर भी खाली हाथ जाता है आदमी

दर्द कितना सहता है ,कितने गम उठता है आदमी
बुझा कर रात रहते ही चिराग ,रौशनी कल के लिए बचाता है आदमी
        कितना बेबस है फिर भी खाली हाथ जाता है आदमी

चार दिन कि जिंदगी में आराम का हर सामान जुटाता है आदमी
      कितना बेबस है फिर भी खाली हाथ जाता है आदमी

No comments:

Post a Comment