Saturday, September 4, 2010

nazare

कितनी न हसी है यह जिंदगी
हर और हसीं नज़ारे नज़र आते है

हर शाख लहरा रही अपनी धुन में
कि उसे भी चाहत है इन नजारो कि

ओंस कि इन बूंदों के क्या कहने
वोह तो इतरा रही है पतों से लिपट कर

खुशबू से सारोबार किया है इन मदहोश फूलो ने
कि अब वोह कली से फूल बने है बगीचे में

ऐ दोस्त जरा सम्बल कर चलना इन बगीचों में
नाज़ुक है बहुत ये फूल जो सहर में बने है कली से

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