कियोकर न पिए कोही इन सुनसान विरानो में
न दूर तक दिखती है कोई नज़र इन रस भरे बागो में
था इंतज़ार किसी साकी के आने का
न आये वो घंटो इंतज़ार के बाद भी
कि चाहत थी मुझे छूने कि इन प्यार भरे लम्हों कि
कि अब न आएगी कभी ये रात इन लम्हों को भुलाने कि
आती है आहट बार बार किसी के छम छम कदमो कि
कि आस जाति नहीं उन मध् भरी आँखों कि .
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