जी भर कर नमन है बसंत की इस प्रभात वेला को
रिम जिम बुँदे टपक रही है रह रह कर पावन धरती पर
हां अब टहनिया लहरा रही है मंद मंद समर के साथ
ऐसे झूल रही है लदे महकते गुलाब के घुछो के साथ
चंदा भी शर्मा रहा है देख देख कर महकते गुलाब को
कि हो जाना है उसे अब ओजल कि आने को है उजाला
लाली गुलाब कि छिरक आही है कि आगमन उजाले का
कि सूर्य दर्शन को है तेयार जग में अंधियारे के बाद
कोटि कोटि नमन है सूर्य को जग में उजियारे के साथ
कि है शुरुआत जग में नए दिन कि उजियारे के साथ

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