Sunday, September 25, 2011

morning

जी भर कर नमन है बसंत की इस प्रभात वेला को
रिम जिम बुँदे टपक रही है रह रह कर पावन धरती पर

हां अब टहनिया लहरा रही है मंद मंद समर के साथ
ऐसे  झूल रही है लदे महकते गुलाब के  घुछो के साथ

चंदा भी शर्मा रहा है देख देख कर महकते गुलाब को
कि हो  जाना है उसे अब ओजल कि आने को है उजाला

लाली गुलाब कि छिरक आही है कि आगमन उजाले का
कि सूर्य दर्शन को है तेयार जग में अंधियारे के बाद

कोटि कोटि नमन है सूर्य को जग में उजियारे के साथ
कि है शुरुआत  जग में नए दिन कि उजियारे के साथ

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