Wednesday, September 15, 2010

ankhe

तुम रोज़ कियो इतना पीते  हो, पीकर गिर परते हो
किया तुमने सोचा है कभी कि इसे तुम पीते हो या ये तुमे पीती है

पीने को और बहुत है इस दुनिया में, कियो इक ज़हर पीते हो शाम होने को
शाम तो रंगी और खुशनुमा होती है ,कियो नहीं पीते इन मद भरी आँखों से

मदहोश रहती है ये आँखे हमेशा कुछ पाने को ,कि शाम हुई है पाने को
अह दोस्त न पीना दूर  उस ज़हर भरे प्याले को ,कि अमृत भरा है इन दो पास भरे प्यालो में

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