glimpse
Saturday, September 25, 2010
kashish
कशिश है इन आँखों में कुछ पाने कि
कशिश है इन हाथो में कुछ छूने कि
कशिश है दिल से निकली आवाज़ होठो पर आने कि
कशिश है अपने अरमान बरसो से पूरे करने कि
कशिश है दो जवान दिलो के दिल मिलाने कि
कि बरसो से जगी आग अब मिटाने कि
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