Monday, September 27, 2010

insaniet

कितना बदल गया है ये इन्सान कि भूल गया इन्सानिएत
न होश उसे चाहत का न होश उसे रिश्तो का, अपनेपन का

न याद उसे उस बचपन कि  न याद उसे उस बीते पलो कि
कि इन पलो पर कितनी प्यार से बिताई थी वो राते और दिन

दूर खंडर सी  नज़र आती  है वो आराम देती वो छत और ईटे
कहा है वो बाग़ और बगीचे जिस में खाए थे खूब शहतूत घनेरे

कहा है वोह बहिन भाई जो थे साथ हर समय हर दुःख सुख में
कहा गयी माँ कि प्यारी गोद और पिता कि प्यार भरी भाए

न दूंड अह दोस्त ये सब कि सब गवा दिया तुमने इस रुपैये कि खातिर
कि सब कुछ लुट गया इस धरती से तुम्हारे इस रुपैये के खातिर

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